कभी तो तुम्हारे साथ, अपनी शाम गुजरेगी,
वर्ना ये ज़िन्दगी, किस काम गुजरेगी.
आँखों में लेकर सपने, यूँ चले जा रहे हैं,
कभी तो इस राह से, मुकाम गुजरेगी.
By Amar Nath Giri Akash
GIRI TRADEMARK
GIRI LAWFIRM
Friday 23 April 2010
Wednesday 21 April 2010
और क्या बताएं
और क्या बताएं, ज़माना ख़राब है .
पीते हैं जैसे पानी, होती शराब है.
देखी थी इश्के उल्फत, नफ़रत में जी रहे हैं.
वो भी ख़राब थी, ये भी ख़राब है.
By Amar Nath Giri Akash
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पीते हैं जैसे पानी, होती शराब है.
देखी थी इश्के उल्फत, नफ़रत में जी रहे हैं.
वो भी ख़राब थी, ये भी ख़राब है.
By Amar Nath Giri Akash
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Thursday 15 April 2010
डेंगू का मच्छर
कटलेट की तरह, प्लेटलेट्स खा जाता है,
पूछता हूँ -
ई ससुरा डेंगू का मच्छर !
कहाँ से आता है ?
पहले मच्छर रात में काटता था,
तो शुक्र था !
इंसान, कभी मच्छरदानी, कभी गुडनाईट,
तो कभी क्वाइल से काम चलाता था,
फिर भी बिचारा मच्छर,
मौका मिलते ही,
कान में गीत सुनाता था।
लेकीन ई ससुरा डेंगू का मच्छर !
दिन में चुपके से काटता है,
जीसके सामने सारा मेडीकल साईंस धूल चाटता है।
दोस्तों गया वो ज़माना,
जब मच्छर की तरह,
मसलने की बात होती थी,
अब तो मच्छर आपस में बात करते हैं -
तुम्हें इंसान की तरह मसल दूंगा !
मैंने एक डेंगू के मरीज को,
प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती कराया,
वहां का भारी भरकम बिल देखकर,
मेरा माथा चकराया ।
मैंनें सोचा मरीज ठीक होगा या नहीं,
मगर घर वाले तो मर जायेंगें,
इस इलाज में जो कर्ज होगा,
ताउम्र नहीं चुका पायेंगें ।
आख़िर भाग-दौड़ करके मैंनें,
सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया,
वहां एक ही बिस्तर पर,
तीन-तीन मरीजों को पाया।
कोई चिल्ला रहा था, कोई घबरा रहा था,
कोई ज़िन्दगी पर आंशु, बहा रहा था,
न कोई हिंदू था न कोई मुसलमान था,
दर्द में तड़पता, हर कोई इंसान था ।
मरीज़ तो ठीक हो गया,
मगर एक सवाल मन में बाकि है,
कि एक अदना सा मच्छर,
कब तक हमें रुलाएगा ?
और चाँद फतह कराने वाला इंसान,
कब डेंगू पर विजय पायेगा ?
पूछता हूँ -
ई ससुरा डेंगू का मच्छर !
कहाँ से आता है ?
पहले मच्छर रात में काटता था,
तो शुक्र था !
इंसान, कभी मच्छरदानी, कभी गुडनाईट,
तो कभी क्वाइल से काम चलाता था,
फिर भी बिचारा मच्छर,
मौका मिलते ही,
कान में गीत सुनाता था।
लेकीन ई ससुरा डेंगू का मच्छर !
दिन में चुपके से काटता है,
जीसके सामने सारा मेडीकल साईंस धूल चाटता है।
दोस्तों गया वो ज़माना,
जब मच्छर की तरह,
मसलने की बात होती थी,
अब तो मच्छर आपस में बात करते हैं -
तुम्हें इंसान की तरह मसल दूंगा !
मैंने एक डेंगू के मरीज को,
प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती कराया,
वहां का भारी भरकम बिल देखकर,
मेरा माथा चकराया ।
मैंनें सोचा मरीज ठीक होगा या नहीं,
मगर घर वाले तो मर जायेंगें,
इस इलाज में जो कर्ज होगा,
ताउम्र नहीं चुका पायेंगें ।
आख़िर भाग-दौड़ करके मैंनें,
सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया,
वहां एक ही बिस्तर पर,
तीन-तीन मरीजों को पाया।
कोई चिल्ला रहा था, कोई घबरा रहा था,
कोई ज़िन्दगी पर आंशु, बहा रहा था,
न कोई हिंदू था न कोई मुसलमान था,
दर्द में तड़पता, हर कोई इंसान था ।
मरीज़ तो ठीक हो गया,
मगर एक सवाल मन में बाकि है,
कि एक अदना सा मच्छर,
कब तक हमें रुलाएगा ?
और चाँद फतह कराने वाला इंसान,
कब डेंगू पर विजय पायेगा ?
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